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देश और प्रदेशो से गायब हो जायेंगे झेत्रिय मुददे और झेत्रीय पार्टिया क्या यह जनता के लिए सही होगा / ​


रायबरेली में महामहिम राश्ट्रपति का गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले दिया गया देष के नाम सन्देष में कहा था कि लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक साथ कराया जाना चाहिये। जिससे देष में धन और समय की बचत होती है साथ ही भ्रश्टाचार पर भी रोक लगेगी। इस पर आज जिले के कई बुद्धिजीवी वर्ग ने अपनी अपनी राय दी है। किसी ने सही तो किसी गलत भी बताया है

        रायबरेली के जितेन्द्र पाण्डेय एडवोकेट का कहना है कि महामहिम राश्ट्रपति का गणतंत्र दिवस पर एक अच्छा बयान आया है, अगर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते है। तो इससे धन और समय की बचत तो होगी ही साथ ही भ्रश्टाचार पर भी कही न कही रोक लगेगी और इससे राजनीतिक लोगों को भी फायदा होगा। क्योंकि उनको अलग अलग चुनावों में धन और समय तो लगाते ही है साथ ही सरकारी मषीनरी का उपयोग होता है उसमें भी बचत होगी। और जनता को अपने वोट को एक ही समय में दोनो प्रत्यासीयों को चुन सकेंगें जिसमे एक विधानसभा का दूसरा लोकसभा से। और जनता को चुनाव मंे खर्चा करना होता है उसमें में काफी कमी आयेगी।

         बैजनाथ मौर्या पंचषील पीजी कालेज उचांहार प्रबन्धक है उनका  कहना है कि महामहिम राश्ट्रपति जी ने एक अहम एवं महात्वपूर्ण सुक्षाव दिया है। लेकिन यदि इस पर चुनाव आयोग और सभी राजनीतिक पार्टीयों अमल करते है तो बहुत अच्छा होगा।  विधानसभा और लोकसभा का चुनाव एक साथ होता है तो इससे लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी। साथ ही अनावाष्यक धन का खर्चा होना और भ्रश्टाचार पर भी पाबन्दी लगेगी। और राजनीतिक नेताओं को चुनाव में अपने मुददे एक समय में ही जनता में बताने का मौका मिल जायेगा जिससे जनता उन छोटे और बड़े मुददों को समझने और सुलझाने का समय मिल जाता और जनता पर धन का बोझ भी कम पडता है क्योकि आये दिन चुनाव होने से जनता पर ही टैक्स का बोझ उठाने को मजबूर होना पड़ता है। इसलिये यह सुक्षाव पर काफी लोगों को पसन्द  आया है। लेकिन अभी तो एक सु़क्षाव दिया गया है इस पर अभी राजनीतिक मथंन तो अभी षुरुआत भी नही हुई है। आगे क्या होगा ये तो चुनाव आयोग और राजनीतिक पार्टीयों के हाथ में है।

          विजय विद्रोही जो प्रवक्ता के तौर पर जिले में जाने जाते है लेकिन पेषे से वकील है।  इनका मानना है इस बात का कोई मतलब नही है क्योकि लोकसभा का चुनाव राश्ट्रीय स्तर पर होता है और इनके मुददे राश्ट्रीय स्तर के होते है। जबकि विधानसभा का चुनाव क्षेत्रीय स्तर पर होते है और इसमें जो मुददे होते है वह क्षेत्रीय ज्यादा होते है। क्योंकि इन दोनो चुनावों में काफी अन्तर होता है और जनता राश्ट्रीय स्तर पर कम ध्यान देती है इसमें उच्च वर्ग और मध्यम वर्ग का कुछ हिस्सा ही इस पर ध्यान देता है, जबकि विधानसभा के चुनावों में ग्रामीण और षहरी वर्ग में देखा जाये तो 75 प्रतिषत लोगों के मुददे देखने को मिलेगा क्योकि जनता में छोटी छोटी जरुरतों के लिये अपने जीवन में संघर्श करता है जबकि राश्ट्रीय मुददों को ज्यादा ध्यान नही दिया जाता है।
दूसरा कारण यह भी है कि देष में 17 प्रकार के चुनाव होते है ग्राम पचांयत एंव नगरपालिका से लेकर लोकसभा तक इन सभी चुनावों को एक साथ क्यों नही कराया जाये । इससे काफी फायदा मिलेंगा।  साथ ही इन दोनों लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ अगर होते है तो क्षेत्रीय और छोटी पार्टियों का अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा । और राश्ट्रीय पाटियों को ही महात्व मिलेगा, साथ ही छोटे छोटे प्रष्न और लोगों के मुददे भी खत्म हो जायेगें। क्योंकि सभी चुनावों के प्रष्न और मुददे अलग अलग होते है इसलियें सभी का एक ढाचां बनाये जिसमें सभी एक साथ चुनावों हो और सभी का एक घोशणा पत्र हो जिससे जनता उन मुददों को सही ढंग से समझ सकें और एक ही बार में सभी चुनावों में वोट डाल सकें । जिसमें सरकारी मषीनरी और आम जनमानस को भी लाभ मिल सके और देष और प्रदेष का विकास हो सकेगा ।  लेकिन अगर इस पर एक चुनाव आयोग सर्वे कराये पूरे देष में तो कुछ तो जनता की राय निकल कर सामने आयेगी और लोगों के अपने विचार साथ ही राजनीतिक लोगों के भी विचार सामने आ जायेगें।

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