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स्मार्टफोन ओर हमारा सामाजिक अर्थशास्त्र

भारत सचमुच विचित्रताओं का देश है। जहां पूरी दुनिया में स्मार्टफोन की मांग लगातार बढ़ रही है, वहीं भारत में फीचर फोन अब भी लोगों की पहली पसंद हैं, जो 2-जी नेटवर्क पर काम करते हैं। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए नोकिया अपने सस्ते फीचर फोन 3310 के साथ भारत में पुन: वापसी कर रही है, ताकि वह उन भारतीय ग्राहकों को लुभा सके, जो महंगे स्मार्टफोन नहीं खरीद सकते। सिंगापुर, ताईवान व ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने जहां 2-जी नेटवर्क को अलविदा कह दिया है, वहीं भारत में 2-जी नेटवर्क के सहारे साधारण फीचर फोन कम कीमत, ज्यादा बैटरी लाइफ, संगीत सुनने की सुविधा व बेसिक इंटरनेट सेवा के साथ भारत में लोगों को ऑनलाइन जोड़ रहा है।


फीचर फोन से तात्पर्य उन मोबाइल फोन से है, जिनका प्रयोग वॉयस कॉलिंग और टेक्स्ट मैसेज के लिए किया जाता है। इसके अलावा इनमें बेसिक मल्टीमीडिया सुविधा होती है, जिससे ऑडियो-वीडियो सुविधाओं का आनंद उठाया जा सकता है। ये बहुत कम कीमत में उपलब्ध हैं। वहीं पर स्मार्टफोन इंटरनेट आधारित हैं, जो बात करने के अलावा इंटरनेट की दुनिया में एप सुविधाओं के साथ असीमित विकल्प देते हैं। ये फीचर फोन के मुकाबले महंगे होते हैं और इनकी परिचालन कीमत भी महंगी होती है। ये टच स्क्रीन सुविधा पर चलते हैं।

वैसे भी, शहरों में देखा गया है कि आजकल लोग दो फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं- साधारण फीचर फोन बात करने के लिए और इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए स्मार्टफोन। आंकड़ों की रोशनी में यह तथ्य ज्यादा स्पष्ट तस्वीर पेश करता है। मोबाइल मार्केटिंग एसोशिएशन व मार्केट रिसर्च फर्म कन्टर आईएमआरबी के देश के आठ शहरों में किए गए शोध से यह निष्कर्ष निकला है कि फीचर फोन धारकों में से मात्र 15 प्रतिशत उपयोगकर्ता अपनी अगली फोन खरीद में अपने फोन को स्मार्टफोन में बदलना चाहते हैं। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, इस वक्त 85 प्रतिशत शहरी भारतीय मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहा है, पर इनमें से 56 प्रतिशत फीचर फोन ही इस्तेमाल कर रहे हैं। फीचर फोन की बढ़ती लोकप्रियता का बड़ा कारण भारतीय परिस्थितियों में इनका एक औसत भारतीय के लिए सस्ता होना, दूसरा बिजली की कम उपलब्धता और स्मार्टफोन की बैटरी का जल्दी से खर्च होना है, जिससे उनको बार-बार चार्ज करना पड़ता है। वहीं फीचर फोन की बैटरी एक बार चार्ज करने के बाद लंबे समय तक चलती है।

फीचर फोन पुश बटन पर चलते हैं, जिसको चलाने के लिए किसी तरह की विशेषज्ञता की जरूरत नहीं होती है। यहां फोन का मतलब बातें करना और मैसेज भेजना भर है। अशिक्षा की वजह से इंटरनेट की बेसिक सुविधाओं का भी इस्तेमाल नहीं किया जाता। लोगों के फीचर फोन पर इंटरनेट का ज्यादा प्रयोग न करने की एक बड़ी वजह इंटरनेट पर अब भी क्षेत्रीय भाषाओं में उतना कंटेंट नहीं है, जितना अंग्रेजी में है, और भारत का बड़ा तबका अब भी अशिक्षित है। इंटरनेट पर 55.8 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में है, जबकि दुनिया की पांच प्रतिशत से भी कम आबादी अंग्रेजी का इस्तेमाल अपनी प्रथम भाषा के रूप में करती है। इसके बरक्स अरबी या हिंदी जैसी भाषाओं में, जो दुनिया में बड़े पैमाने पर बोली जाती हैं, इंटरनेट सामग्री क्रमश: 0.8 और 0.1 प्रतिशत उपलब्ध है।
बीते कुछ वर्षों में इंटरनेट और कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स जिस तरह लोगों की अभिव्यक्ति व अपेक्षाओं का माध्यम बनकर उभरी हैं, वह उल्लेखनीय जरूर है, मगर भारत की भाषाओं में जैसी विविधता है, वह इंटरनेट में नहीं दिखती। आज 40 करोड़ भारतीय अंग्रेजी भाषा की बजाय हिंदी भाषा की ज्यादा समझ रखते हैं, लिहाजा भारत में इंटरनेट को तभी गति मिल सकती है, जब इसकी अधिकतर सामग्री हिंदी समेत अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में हो।

स्मार्टफोन टच सक्रीन सुविधा से युक्त होते हैं। इनको चलाने के लिए थोडे़ अभ्यास की जरूरत पड़ती है। जाहिर है, तकनीक की सुलभता ही लोगों को उसके इस्तेमाल के लिए प्रेरित नहीं करती, बल्कि इसके पीछे प्रयोगकर्ता की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि भी काफी जिम्मेदार होती है। इसलिए फीचर फोन से स्मार्र्टफोन की तरफ एक आम भारतीय तब ज्यादा तेजी से बढ़ेगा, जब उसके आस-पास की परिस्थितियां बदलेंगी।

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