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आठवीं तक फेल नहीं करना कितना उचित।

आठवीं तक फेल नहीं करना कितना उचित? 



पहले शिक्षा के मौजूदा सिस्टम में बदलाव जरूरी (रोहित धनकर)
शिक्षा अधिकार कानून (आरटीई) में आठवीं कक्षा तक बच्चों को अनुत्र्तीण नहीं करने के प्रावधान पर नीति आयोग की टिप्पणी अपनी जगह सही हो सकती है। नीति आयोग का कहना है कि आठवीं तक फेल नहीं करने के मौजूदा प्रावधान की समीक्षा की जानी चाहिए । वजह यह बताई गई है कि इस प्रावधान के कारण बड़ी कक्षाओं में जाकर भी बच्चों को छोटी कक्षाओं का ही ज्ञान नहीं हो पाता। इससे शिक्षा की गुणवत्ता पर विपरीत असर पड़ता है।
यह बात सही है कि ऐसा प्रावधान बच्चों को इस बात का लाइसेंस देता है कि पढऩे-लिखने की जरूरत नहीं है। बच्चों के शैक्षणिक उन्नयन के लिए इस तरह की पॉलिसी को यूं तो ठीक नहीं कहा जा सकता। लेकिन फेल करने या न करने, दोनों ही स्थिति में हमें मौजूदा सिस्टम को बदलना होगा। इसके लिए ग्रेडिंग सिस्टम किए गए बच्चों के सतत मूल्यांकन की व्यवस्था करनी होगी।
बच्चे का लगातार मूल्यांकन होगा तो उसकी प्रतिभा और आगे बढऩे के अवसरों का ठीक आकलन संभव हो सकेगा। लेकिन असल बात तो यह है कि हम शैक्षणिक सुधार की दिशा में मेहनत ही नहीं करना चाहते। सुधार के नाम छोटे-छोटे टुकड़े डाल रहे हैं जो बच्चों और अभिभावकों दोनों के साथ बेईमानी है। यह बात सही है कि आरटीइआई के प्रावधानों को लेकर दोनों पक्षों के अलग-अलग तर्क है।
एक पक्ष इस मत का है कि आठवीं तक बच्चों को फेल नहीं करने से शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। दूसरा पक्ष फेल करने की वजह से बीच में ही पढ़ाई छोडऩे वाले बच्चों की बढ़ती संख्या से चिंतित है। मेरा मानना है कि मौजूदा सिस्टम में आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल नहीं करते तो भी गलत है और फेल करते हैं तो भी।
जब तक सिस्टम में बदलाव नहीं करेंगे कोई फायदा होने वाला नहीं। आरटीई में आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल नहीं किया जाता तो पहले से ही कमजोर बच्चा और कमजोर होगा। सीधे-सीधे न तो खुद बच्चों को और न ही शिक्षकों को उनकी पढ़ाई को लेकर परवाह होगी। यह तो वैसा ही है जैसे पहले ही हमारे लोटे में दो बूंद पानी है और उसमें छेद कर दिया जाए। हमें यह देखना होगा कि बच्चों को फेल या पास करना और गुणवत्ता बनाए रखना अलग-अलग है।
बच्चे के स्कूल छोडऩे की नौबत तब आती है जब उसके आगे सीखने की संभावना खत्म हो जाती है। वहीं कोई बच्चा बिना सीखे भी पन्द्रह साल तक रह जाए तो उसके आगे सीखने की संभावना तो वैसे ही खत्म हो जाती है। ऐसे में मेरा मानना है कि वास्तव में हमें कुछ करना है तो शिक्षा व परीक्षा के मौजूदा ढांचे पर पुनर्विचार करना होगा। ऐसा नहीं किया गया तो कितनी ही सिफारिशें हो जाए बच्चों की पढ़ाई की दृष्टि से कमजोर नींव बनी रहेगी। ऐसे में इससे कोई फर्क पडऩे वाला नहीं कि उनको आठवीं कक्षा तक फेल नहीं किया जाए या फिर पांचवी कक्षा तक।
परीक्षा वाली शिक्षा प्रणाली खत्म करना भी है उपाय (मुकुल कानिटकर )
यह बात सही है कि हमारे यहां स्कूली शिक्षा में बीच में ही पढ़ाई छोडऩे वाले बच्चों की संख्या काफी हैं। शायद इस आंकड़े को देखते हुए ही आठवीं कक्षा तक फेल नहीं करने का प्रावधान शिक्षा अधिकार कानून के तहत किया गया था। सबसे बड़ी बात परीक्षा के ‘हौव्वे’ की है। हमारा शुरू से ही यह मानना है कि परीक्षा विहीन शिक्षा सबसे बेहतर है। लेकिन आज के दौर में इसको अपनाना भी आसान नहीं है।
आठवीं तक फेल नहीं करने की मौजूदा नीति की समीक्षा की बात हो रही है तो परीक्षाविहीन शिक्षा प्रणाली को धीरे-धीरे लागू कर बच्चों में पढ़ाई का खौफ कम किया जा सकता है। सबसे पहले शिक्षकों को इस तरह का प्रशिक्षण देना होगा जिससे वे कठिन समझे जाने विषयों को भी सरल तरीके से बच्चों को पढ़ा सकें। इस प्रणाली को धीरे-धीरे पहले निचली कक्षाओं में और इसके बाद आठवीं कक्षा तक लागू किया जा सकता है।
आठवीं कक्षा तक फेल नहीं करने के प्रावधान के पीछे भावना तो अच्छी थी लेकिन लगता है कि इसके लिए हमारी तैयारी पर्याप्त नहीं हो पाई। इसीलिए इस पर पुनर्विचार की जरूरत महसूस की जाने लगी है। यह बात भी सही है कि मौजूदा प्रावधानों में फेरबदल किया गया तो बीच में ही पढ़ाई छोडऩे वाले बच्चों की संख्या पर काबू करना इतना आसान नहीं होगा। इसका समाधान यह भी हो सकता है कि पहली से आठवीं कक्षा तक परीक्षा में फेल नहीं करने मौजूदा व्यवस्था को लागू करते हुए पढ़ाई में कमजोर बच्चों के लिए विशेष कक्षाएं लगाई जाएं।
दूसरा महाराष्ट्र में लागू शिक्षा के मॉडल पर भी विचार किया जा सकता है। एक बड़ी समस्या यह आती है कि आठवीं तक फेल नहीं करने की नीति अपनाने पर आगे की कक्षाओं में फेल होने वालों की संख्या बढ़ जाती है। महाराष्ट्र मॉडल के मुताबिक वहां पर 10 वीं कक्षा में फेल होने वाले विद्यार्थी हर तीन माह में पूरक परीक्षा ली जाती हैा छात्र जिस विषय में फेल हुआ हो उसकी पूरक परीक्षा देकर पास हो जाता है।
हालांकि यह कोई ठोस समाधान नहीं है। लेकिन इस तरह से धीरे-धीरे परीक्षा लेकर पास करना भी बिना परीक्षा के पास करने से बेहतर है। आज की जो शिक्षा व्यवस्था है उसमें तो बच्चों का ध्यान सिर्फ परीक्षाओं पर ही केन्द्रित रहता है। हां इतना जरूर है कि उच्च शिक्षा में परीक्षा व्यवस्था बरकरार रखी जानी चाहिए।
व्यावसायिक और सामान्य कोर्स में दाखिले के लिए लगभग सभी प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश परीक्षा ली जाती है। माना जाता है कि जो प्रवेश परीक्षा जितनी कठिन होती है उसमें विद्यार्थी उतना ही ज्यादा पढ़ते हैं। दूसरी ओर स्कूली शिक्षा में यह देखने को मिलता है कि विद्यार्थी जिस कक्षा में पढ़ रहा है उससे नीचे की कक्षाओं के स्तर का ज्ञान भी उसे नहीं होता है। ऐसे में हमें बेहतर विकल्प खोजने होंगे।

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