राजनीतिक परिवारो का वर्चस्व क्यों लगातार बढ़ता जा रहा है आगे और आम जनता राजनीति में आगे क्यों नहीं आ रही है इसके पीछे क्या कारण है?
1. राजनीतिक परिवारो का वर्चस्व क्यों लगातार बढ़ता जा रहा है आगे, और आम जनता आगे राजनीति में क्यों नहीं आ रही है इसके पीछे क्या कारण है?
यह सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई लोकतंत्रों (जैसे अमेरिका, पाकिस्तान, बांग्लादेश) में एक सामान्य घटना है। इसके पीछे कई कारण हैं:
नाम की पहचान और ब्रांड वैल्यू: -
एक राजनीतिक परिवार का नाम अपने आप में एक "ब्रांड" बन जाता है। आम जनता उस नाम से भावनात्मक रूप से जुड़ी होती है। नया उम्मीदवार चुनने के बजाय उसी परिवार के युवा सदस्य को टिकट देना पार्टी के लिए एक "सुरक्षित दांव" (Safe Bet) माना जाता है।
पहुँच और संसाधन: -
राजनीतिक परिवारों के पास पहले से ही नेटवर्क, पैसा, और अधिकारियों तक पहुँच होती है। एक आम इंसान के लिए इतने बड़े पैमाने का चुनाव लड़ना बेहद खर्चीला और मुश्किल होता है।
पार्टी संरचना: -
कई राजनीतिक दलों का संगठनात्मक ढाँचा कमजोर है। उनमें आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। निर्णय कुछ चुनिंदा लोग (अक्सर एक परिवार) लेते हैं, इसलिए टिकट भी उन्हीं के लोगों को मिलता है।
वोटर का मानसिकता: -
एक हड़बड़ी में, मतदाता परिचित नाम को ही वोट दे देता है क्योंकि उसे लगता है कि यह "आजमाया हुआ" है। नए चेहरे को जानने-परखने का समय और ऊर्जा अक्सर लोगों के पास नहीं होती।
2. आम जनता राजनीति में क्यों नहीं आ पा रही?
आम जनता राजनीति में आती है, लेकिन उसे सफल होने में जबरदस्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है:
धन और बल की शक्ति:-
चुनाव लड़ने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर धन की आवश्यकता होती है। प्रचार, कर्मचारी, यात्रा आदि पर होने वाला खर्च एक आम आदमी के बस की बात नहीं है।
सिस्टम का दबाव:-
राजनीति में आने वाले नए लोगों को मजबूत और स्थापित नेताओं के खिलाफ खड़ा होना पड़ता है, जिनके पास प्रशासनिक तंत्र पर प्रभाव होता है। अक्सर उन्हें धमकियाँ और दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
मीडिया का ध्यान: -
मीडिया का ज्यादातर ध्यान स्थापित राजनीतिक परिवारों और उनकी गतिविधियों पर ही केंद्रित रहता है। एक आम इंसान को मीडिया में जगह मिलना और अपनी बात पहुँचाना मुश्किल होता है।
जाति और समीकरण: -
कई चुनाव क्षेत्रों में जातिगत और सामुदायिक समीकरण हावी होते हैं। पार्टियाँ उसी उम्मीदवार को टिकट देती हैं जो इन समीकरणों पर खरा उतरता हो, न कि सबसे योग्य व्यक्ति को।
3. क्या कुछ पार्टी के कार्यकर्ता सिर्फ ताली बजाने और झंडा लेकर दौड़ने के लिए ही है?
बिल्कुल नहीं। यह धारणा पूरी तरह से गलत।
भीड़ जुटाना एक रणनीति है:-
राजनीतिक रैलियों में भीड़ जुटाना एक सोची-समझी रणनीति है। पार्टियाँ पैसे देकर, परिवहन का इंतजाम करके, या फिर कार्यकर्ताओं के जरिए लोगों को जुटाती हैं। यह "जनसमर्थन" दिखाने का एक तरीका है, भले ही वहाँ मौजूद सभी लोग वास्तविक समर्थक न हों।
आम जनता की भूमिका निर्णायक है: -
अंततः, मतदान के दिन वही "आम जनता और कार्यकर्ता" अपना मतदान करके सरकार चुनती है। वह ताली बजाने वाली भीड़ ही है जो फैसला करती है कि किसे सत्ता में बैठाना है और किसे हटाना है।
जागरूकता बढ़ रही है:-
सोशल मीडिया और शिक्षा के प्रसार के साथ, आम जनता अब पहले से कहीं अधिक जागरूक है। लोग सवाल पूछ रहे हैं, जवाबदेही माँग रहे हैं, और केवल भावनाओं में बहने के बजाय विकास और सुशासन को प्राथमिकता दे रहे हैं।
यह सच है कि राजनीतिक घरानों का दबदबा एक चुनौती है, लेकिन यह अटल सत्य नहीं है। भारत में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ आम पृष्ठभूमि के लोग (जैसे मनमोहन सिंह, एपीजे अब्दुल कलाम, और कई मुख्यमंत्री/मंत्री) अपनी योग्यता के बल पर शीर्ष पदों पर पहुँचे हैं।
आम जनता की शक्ति अंततः मतपेटी या एवीएम में ही है। जब मतदाता जाति, धर्म या परिवार के नाम के बजाय योग्यता, चरित्र और विकास के मुद्दों को आधार बनाकर वोट देगा, तब ही इस स्थिति में बदलाव आएगा। यह बदलाव धीमा है, लेकिन निरंतर जारी है।

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