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निराला जयंती 21 फरवरी पर विशेष, डलमऊ ने दिया हिन्दी कविता को निराला

निराला जयंती 21 फरवरी पर विशेष, डलमऊ ने दिया हिन्दी कविता को निराला 
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डलमऊ ने दिया हिन्दी कविता को निराला 
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डलमऊ रायबरेली  महाकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को डलमऊ ने निराला बनाया। बांग्ला भाषा में कविता लिखने वाले निराला को डलमऊ में उनकी विदुषी पत्नी मनोहरा देवी ने हिंदी सिखायी ,उसके बाद वो यहीं रहकर हिंदी कविता के ऐसे अमर गायक बने जो देहधारी होकर भी संतों की परम गति विदेह अवस्था को प्राप्त रहे ।बावजूद इसके डलमऊ में निराला की स्मृतियों को चिरस्थाई बनाने के लिए शासन स्तर से कोई प्रयास नहीं किए गए सरकार की बेरुखी से डलमऊ में राष्ट्रीय स्मारक बनाए जाने की वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार रामनारायण रमण की मांग धूमिल सी हो गई है। महाप्राण निराला की ससुराल दालभ्य  ऋषि की तपस्थली डलमऊ में थी जो सूफी कवि मुल्ला दाऊद की जन्मस्थली भी है ।निराला के जीवन का लंबा समय इसी डलमऊ में बीता। डलमऊ तहसील मुख्यालय की टिकैट गंज मोहल्ले के पंडित रामदयाल द्विवेदी की बेटी मनोहरा देवी से निराला जी का पाणिग्रहण संस्कार  हुआ था ।निराला के पिता बंगाल में रहते थे इसी वजह से निराला अपने पिता के साथ बंगाल में रहकर बांग्ला भाषा के मर्मज्ञ होने के साथ महाकवि रविंद्र नाथ टैगोर से बेहद प्रभावित थे। विवाह के बाद उनकी पत्नी मनोहरा देवी ने उन्हें हिंदी का ज्ञान दिया पत्नी मनोहर देवी ने जब उन्हें रामचंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम ......हारमोनियम पर संगीत बद्ध करके सुनाया तो वह न केवल उन पर रीझ गए बल्कि हिंदी सीखने की ओर उन्मुख हो गए। फलत: उनकी हिंदी साहित्य साधना ने उन्हें बुलंदियों पर पहुंचा दिया यही कारण है कि महाकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की काव्य साधना में करुणा एवं विद्रोह के अंतर पक्ष का डलमऊ से गहरा ताल्लुक है डलमऊ की स्थानी जनता भी निराला की साहित्यिक साधना स्थली रही डलमऊ को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग कर रही है।

पहली मुलाकात में निराला जी के जिगरी दोस्त बने कुल्लीभाट 
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डलमऊ रेलवे स्टेशन से डलमऊ गंगा घाट तक तांगा चलाने वाले पंडित पथवारी दिन शर्मा पहली मुलाकात में ही निराला के मित्र बन गए थे हुआ यह कि निराला जब पहली बार ससुराल आए तो ट्रेन से उतरते स्टेशन पर खड़े पथवारी दीन शर्मा के तांगे से डलमऊ  पहुंचे। इसी मुलाकात से पथवारी दीन शर्मा उर्फ कुल्लीभाट निराला के जिगरी दोस्त बन गए। निराला जी ने उन्हें हिन्दी साहित्य में अमर कर दिया। प्रिय पुत्री सरोज की मृत्यु के उपरांत निराला स्वयं उसके पार्थिव शरीर को लेकर शमशान घाट दाह संस्कार करने गए थे वहां उनका कवि हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने लिखा दुखी ही जीवन की कथा रही क्या कहूं आज जो नहीं कहीं.........। निराला जी ने सरोज स्मृति की यह मार्मिक पंक्तियां डलमऊ की धरती पर ही लिखा था 

डलमऊ की माटी की देन हैं निराला की प्रसिद्ध रचनाएं 
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निराला जी की प्रसिद्ध रचनाएं जूही की कली और बांधों न नाव इस ठांव बन्धु  डलमऊ की माटी की ही देन है निराला और डलमऊ जैसी कालजयी कृति की रचनाकार वरिष्ठ कवि रामनारायण रमण ने डलमऊ में निराला की काव्य साधना को चिरस्थाई  बनाने के लिए अनेकों प्रयास किए हैं । उन्होंने निराला  की स्मृतियों को संजोये रखने के लिए डलमऊ रायबरेली में निराला स्मृति संस्थान का गठन किया । इस संस्था की बुनियाद सन 1981 ई में डाली गई। सन 1981ई से निराला स्मृति संस्थान डलमऊ हर साल 21 फरवरी को जिला जयंती पर उन्हें याद करता है इस अवसर पर पर परि चर्चा गोष्ठी सम्मान समारोह और महाप्राण स्मारिका का प्रकाशन होता चला रहा है। इधर कुछ विसंगतियों से बाधित भी हुआ है।महाप्राण निराला और उनकी धर्मपत्नी मनोहरा देवी की यादों को चिरस्थाई बनाए रखने के लिए डलमऊ के वरिष्ठ साहित्यकार रामनारायण रमण ,वरिष्ठ कवि रमाकांत, कवि प्रदीप श्रीवास्तव, कवि एवं आलोचक वाई .वेद प्रकाश ,रमेश कुमार भारतीय ,सुंदरलाल मनमौजी, सत्य प्रकाश त्रिवेदी ,आशीष बाजपेई ,ललित भारती ओमप्रकाश मनोज कुमार मंजुल ,अमित यादव , आर्यन यादव,सम्राट ,सत्य प्रकाश, आन्या प्रिया, सविता यादव,अंजलि बाजपेई,स्मृति मिश्रा , डॉ जितेन्द्र मौर्या के प्रयास आज भी बने हुई है।

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