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मुंशीगंज काण्ड’ ,और किसान आंदोलन

आजादी की लड़ाई में रायबरेली के सपूतो की भी महती भूमिका रही है गुलामी की जंजीरो से मुक्ती पाने व आजादी की साँस के लिए रायबरेली के राणा बेनी माधव , वीरा पासी जैसे सैकड़ो वीर सपूतो ने हॅसते -हँस्ते  अपने प्राणो को न्यौक्षावर कर इतिहास में अपना नाम सुनहे अक्षरों में लिखा दिया |


13 अप्रैल1919  को भारत के पंजाब प्रान्त के अमृतसर में एक नरसंहार अंग्रेजो द्वारा किया गया था, जिसमें करीब 1000 लोगों को अपनी जानगवानी पड़ी थी और करीब 2000 से अधिक लोग हमले में घायल हुए थे। जिसे इतिहास में जलिया वाला बाग हत्याकांड काण्ड के नाम से जाना जाता है | पंजाब के अलावा भी अंग्रेजों ने देश में एक और हत्याकांड को अंजाम दिया था, जो बिल्कुल जलियांवाला काण्ड की तर्ज पर था। जिसका गवाह देश की राजनीति का मुख्य केंद्र और सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश बना था। उत्तर प्रदेश में एक किसान आन्दोलन को दबाने के लिए जालियांवाला बाग हत्याकांड की तर्ज पर दमन किया गया था।इतिहास में इस घटना को ‘मुंशीगंज काण्ड’3 के नाम से जाना जाता है। मुंशीगंज काण्ड सूबे के रायबरेली जिले में एक किसान आन्दोलन के दमन के लिए किया गया था।यह घटना जलियांवाला बाग हत्याकांड के दो साल बाद 1921 में ही हो गयी थी। हालाँकि, देश के इतिहासकारों द्वारा ‘मुंशीगंज काण्ड’ की पूरी तरह उपेक्षा की गयी है। जिसके बाद ये सिर्फ क्षेत्रीय लोगों के किस्सों का हिस्सा मात्र बनकर रह गया है।

बाईट ----महेश त्रिवेदी ( वरिष्ठ पत्रकार )  फ़ाइल  नम्बर -2
             जीतेन्द्र सिंह  ( रायबरेली स्वातंत्र्य भारत का एक चमकता गौरव  के लेखक ) फ़ाइल -1





जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह, राजगुरु आदि जैसे क्रांतिकारियों को पैदा किया था। जिसके बाद देश में आजादी के लिए एक अलग लहर चली थी, जो महात्मा गांधी या अन्य किसी बड़े चेहरे द्वारा नहीं की गयी थी। किसान आंदोलन तत्कालीन ताल्लुकेदारों व जमीदारो के अत्याचार की उपज थी अवध के किसान तालुकेदारों, जमींदारों और राजाओं के अत्याचारों से पीड़ित होकर अचानक से विद्रोह कर बैठे। किसानों का नेतृत्व तत्कालीन उग्रपंथी नेताओं तथा और साधु-सन्यासियों ने किया था। यह ठीक 1857 की क्रांति के आधार पर था।
साल 1920 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद अवध के किसानों का आन्दोलन शुरू हो गया था।उस दौरान यह आन्दोलन नया और प्रभावशाली आन्दोलन था।हालाँकि यह आन्दोलन जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के तुरंत बाद ही शुरू किया गया था।लेकिन आन्दोलन उग्र साल 1920 के अंत और 1921 की शुरुआत में हुआ था।

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             जीतेन्द्र सिंह  (रायबरेली स्वातंत्र्य भारत का एक चमकता गौरव के लेखक)फ़ाइल न. -2
             जीतेन्द्र सिंह  (रायबरेली स्वातंत्र्य भारत का एक चमकता गौरव के लेखक)फ़ाइल न. -3



अवध के किसानों को उस समय तक अवध के कुछ तथाकथित नेताओं का साथ मिल चुका था। जिसके बाद संगठनात्मक रूप देते हुए ‘अवध किसान सभा’ की स्थापना की गयी।अवध के किसान आन्दोलन के साथ इतिहासकारों ने पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया था।आन्दोलन का एकमात्र जिक्र पूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु ने ‘मेरी कहानी’ में किया था। अवध के तालुकेदार अपनी विलासिता के लिए भी किसानों का शोषण करते थे।
किसान आन्दोलन की शुरुआत का पहला धमाका अवध के प्रतापगढ़ में हुआ।ब्रिटिश सरकार के दमन चक्र से परेशान हो कर किसानों ने जिला कारागार पर आक्रमण कर दिया।जिसके बाद ब्रिटिश सरकार को मजबूरीवश बंदियों को छोड़ना पड़ा।इसके बाद किसानों ने रायबरेली में किसान सभा का आयोजन किया।लेकिन कार्यक्रम से पहले ही तालुकेदारों के गुंडों ने कई बाजारों के लूटने की अफवाह फैला दी।

डलमऊ में चंदनिहा नाम की एक छोटी सी तालुकेदारी रियासत थी।यहाँ के तालुकेदार एक ठाकुर थे, ‘अच्छी जान’ नाम की वेश्या उनकी रखैल थी।कहा जाता है कि, अच्छी जान ही इस रियासत की शासिका थी।अच्छी जान ने इसी दौरान अपने कारिंदों की मदद से एक किसान निहाल सिंह की फसल को आग लगवा दी थी।जिसके बाद किसानों में रोष की भावना और मजबूत हो गयी।

फसल को आग लगाये जाने के बाद किसान नेताओं के नेतृत्व में तीन हजार से अधिक किसानों ने कोठी का घेराव कर लिया।हजारों किसानों का उत्तेजित समूह नारे लगा रहा था, अपनी मांगों की पूर्ति के लिए आवाज़ उठा रहा था।उसी समय तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट एजी शेरिफ तालुकेदार के निवेदन पर पुलिस लेकर पहुंचे।आन्दोलन की अगुवाई कर रहे नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।जिसके बाद यह अफवाह फ़ैल गयी कि, किसान नेताओं की हत्या कर दी गयी है।इसके बाद जो कमी रह गयी थी वो फुर्सतगंज गोलीकांड ने पूरी कर दी।


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मुंशीगंज गोलीकांड का स्थान, परिस्थितियां और वातावरण सब कुछ ही जलियांवाला बाग़ हत्याकांड जैसा था।प्रदर्शनस्थल के एक ओर सई नदी थी, जिसके पुल पर बैलगाड़ियों से पुल के पार खड़ी सेना ने रास्ता रोका हुआ था।दूसरी ओर रेलवे लाइन थी, जिसकी ऊंचाई एक दीवार का काम कर रही थी।पीछे की ओर बाग, सरपत पुंज और रेलवे फाटक था।सड़क और पटरियों के बीच त्रिकोण सी जगह में हजारों किसान प्रदर्शन के लिए जमा हुए थे।किसानों की भीड़ जेल जाकर अपने नेताओं को देखना चाहती थी।सुबह के 9 बजते-बजते सई नदी की रेती में अपार जनसमुद्र देखने को मिलने लगा।एजी. शेरिफ के मुताबिक, उस समय करीब 7 से दस हजार तक किसान मौजूद थे।


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किसानो की भीड़ अपने नेताओ से मिलना चाहती थी | भीड़ बड़ी मुश्किल से पीछे हट रही थी कि, तभी भीड़ छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गयी। जिसके बाद किसी ने किसानों पर गोली चला दी, और उसके बाद किसानों पर अंधाधुंध गोलियां चलायी गयीं।सई नदी की रेत लहुलुहान हो गयी थी, नदी का पानी पूरी तरह से लाल हो गया था।किसानों की लाशों को रातों-रात ही फौजी ट्रकों के सहारे डलमऊ भिजवा दिया गया।रात में इधर-उधर खोजने पर जो लाशें मिली उन्हें सामूहिक रूप से रेत में गाड़ दिया गया।ऐसा भी कहा जाता है कि, पं. जवाहरलाल नेहरु उस वक्त दूसरी ओर खड़ी सेना के पास पहुँच चुके थे।लेकिन एक अंग्रेज अधिकारी ने उन्हें आगे जाने से रोक दिया था।

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