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रायबरेली जायस

रायबरेली के सबसे पुराने जिलों में से एक जायस अपने शिखर के समय में उद्दयन राजा की राजधानी हुआ करता था। ऐसा माना जाता है कि पद्मावत और अखरावत के लेखक महान कवि मलिक मोहम्मद जायसी का जन्म यहीं पर हुआ था। उनकी समृति में यहाँ जायसी स्मारक भी है।

इन्दिरा गाँधी मेमोरियल बोटैनिकल गार्डन

लखनऊ.वाराणसी राजमार्ग पर स्थित इन्दिरा गाँधी मेमोरियल बोटैनिकल गार्डन को 1986 में स्थापित किया गया था। 57 हेक्टेयर के क्षेत्र में फैला यह सई नदी के उत्तरी तट पर स्थित है। यह स्थान केवल पौधोंए फूलों और बगीचों के लिये ही नहीं है बल्कि अनुसंधान करने वालोंए वैज्ञानिकों और पौधों के बारे में और जानने वालों के लिये एक शैक्षणिक संस्थान भी है। यह गार्डेन कई औषधीय और सजावटी पौधों का घर है। यहाँ पर ग्रीनहाउस के अलावा रॉक गार्डेनए रोज़ गार्डेनए मौसमी गार्डेन और जलीय गार्डेन भी है।

समसपुर पक्षी अभ्यारण्य रायबरेली

समसपुर पक्षी अभ्यारण्य रायबरेली में सलोन के पास स्थित है। 1987 में स्थापित यह अभ्यारण्य 780 हेक्टेयर के क्षेत्र में फैला है। यह अभ्यारण्य बहुत ही शान्त स्थान है और रायबरेली के शोरगुल से राहत देता है। प्रवासी और निवासी दोनो प्रकार की लगभग 250 से अधिक प्रजातियों के घर के रूप में यह अभ्यारण्य उत्तरप्रदेश का प्रमुख पक्षी विहार है। इसमें पाये जाने वाले पक्षियों में गिद्धए किंगफिशरए स्पॉट बिलए सामान्य टीलए विज़न और व्ह्सिलिंग टील प्रमुख हैं। अभ्यारण्य में एक झील भी है जिसमें कई प्रकार की मछलियाँ पाई जाती हैं। स्थानीय लोग और पर्यटक यहाँ आकर पक्षियों को देखनेए पिकनिक मनाने या केवल वातावरण की शान्ति को अन्तर्ग्रहण करने का आनन्द लेते हैं। पक्षियों को देखने का सर्वोत्तम समय नवम्बर से मार्च तक का है। यही वह समय होता है जब ऊँचे पहाड़ों से पक्षी और अन्य प्रवासी पक्षी यहाँ आते हैं।

डालमऊ रायबरेली जिले का ऐतिहासिक शहर

पवित्र गंगा नदी के किनारे पर स्थित डालमऊ रायबरेली जिले का ऐतिहासिक शहर है। इस शहर के आकर्षणों में डल राजा का किलाए बड़ा मठ और महेश गिरि मठ प्रमुख हैं। डालमऊ का साहित्यिक इतिहास में भी एक अनूठा स्थान है क्योंकि यह वही स्थान है जहाँ किले पर बैठ कर प्रसिद्ध हिन्दी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी ने नीचे के दृश्यों को देखते हुये अपनी कवितायें लिखी। डालमऊ में नवाब शुजाउद्दौला का इब्राहिम शारिक महल भी है। पर्यटक आल्हा ऊदल की बैठक देखने के साथ.साथ डालमऊ पम्प नहर पर चहल कदमी का आनन्द ले सकते हैं।

इतिहास के पन्नों में खो रहीं धरोहरें

इतिहास के पन्नों में खो रहीं धरोहरें रायबरेली। विश्व धरोहर दिवस तो हम हर साल मनाते हैंए लेकिन उसका मकसद अभी अधूरा है। वीआईपी जिले में अपनों की बेरुखी से जिले की शान मिट रही है। जिनके नाम से जिला जाना जाता हैए उनका अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। चाहे फिर सरकार हो या फिर जिला प्रशासन के अधिकारी और जनप्रतिनिधि। सबकुछ जानकर अंजान बने हैं। कभी धन भी आता हैए लेकिन इन धरोहरों की मरम्मत के बजाय उसका घालमेल किया जाता है। सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र में कई ऐसी धरोहरें हैंए जो जिले की पहचान हैं। इसमें शहर में शहीद स्मारकए रेवती राम तालाब और डलमऊ नगरी में जनानाघाट और पक्का घाट। उपेक्षा की वजह से ये धरोहरों की हालत खस्ताहाल है। शहीद स्मारक में गंदगी फैली है। मरम्मत के अभाव में शहीद स्मारक जर्जर हो रहा है। अब बात बड़ा कुआं की जाए तो वह भी बदहाल पड़ा है। हालात ये हैं कि शहर का कूड़ा इसी कुएं में फेंका जाता है। बड़ा कुआं को कई बार पर्यटन स्थल का रूप देने के लिए नागरिकों ने आवाज उठाईए लेकिन जिला प्रशासन के अधिकारी और सरकारए जनप्रतिनिधियों ने ध्यान नहीं दिया। डलमऊ नगरी के जनानाघाट और पक्का घाट का...

रायबरेली की ट्राफिक व्यवस्था को लेकर आशीष सिंह के विचार।

रायबरेली हाल ही में एक समाचार आया कि नीदरलैंड के एक शहर में सड़क की बत्तियों को ज़मीन पर लगा दिया क्योंकि लोग अपने फ़ोन में इतने व्यस्त रहते हैं कि ऊपर सर उठाकर देखना नहीं चाहत...

परीक्षा और प्रश्नपत्रों पर कुछ बेसिक सवाल

भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं के पीछे का जितना बैकग्राउंड काम है उसको सँभालने वाले तंत्र कितने विश्वसनीय और योग्य हैं? सामान्यतः सरकार का वह विभाग या एजेंसी जो किसी प्रत...

वीवीआईपी रायबरेली में जिले में केंद्र हो या प्रदेश की सरकारों के मंत्री केवल दिखाते आये जनता को सपने,

सूबे के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने ड्यूटी से गायब रहने वाले 23 डॉक्टरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए। सूबे के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिं...

स्मार्ट तो ठीक, पर नए शहर कहां?

स्मार्ट तो ठीक, पर नए शहर कहां? (अमर उजाला) इन उम्र से लंबी सड़कों को, मंजिल पे पहुंचते देखा नहीं। बस दौड़ती, फिरती रहती हैं, हमने तो ठहरते देखा नहीं। थकी-हारी शहरी जिंदगी के दर्द को बेहतर ढंग से बयान करने के लिए ही गुलजार ने ये पंक्तियां लिखी थीं, जो शायद राजनीतिक वायदों के पूरा होने के कभी खत्म न होने वाले इंतजार को भी व्यक्त करती हैं। युवा, मध्यवर्ग और शहरी भारतीय, नरेंद्र मोदी के 2014 के चुनावी अभियान के ये सभी मुरीद थे। इसकी वजह यह थी कि इसमें समाधान का वायदा था। इसमें सबसे शानदार वायदा था सौ स्मार्ट शहर बनाने का। अपनी बदहाल जिंदगी से त्रस्त शहरी भारतीयों को इस वायदे में बेहतर भविष्य की उम्मीद दिखी। मोदी ने इस चुनौती में मौका देखा, और एक कामयाब नारे का सूत्रपात कर दिया। मगर यह कोई चुनावी नारा नहीं था। भारतीय जनता पार्टी के 2014 के चुनावी घोषणापत्र में कहा गया था, ′ह...

जितनी बार गिरें, उतनी बार खड़े होना चाहिए

मैं राजकपूर, मनमोहन देसाई, यश चोपड़ा जैसे निर्माता-निर्देशकों की फिल्में देखकर ही बड़ा हुआ हूं। पला-बढ़ा हिंदी फिल्मों के सितारों और निर्देशकों के बीच, लेकिन मैंने जब सोचा की मुझे फिल्मों में आना है तो मदद करने वाला कोई नहीं था। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है अच्छा ही हुआ कि किसी ने मदद नहीं की। मेरे पिता या मामाजी (ख्यात अभिनेता जितेन्द्र ) फिल्म इंडस्ट्री में हैं तो उनके लिहाज से एक आध मौका मुझे मिल जाता, लेकिन अपने पैरों पर तो नहीं खड़ा हो पाता। शुरुआत में मदद पाने वाले अगर आगे चलकर असफल हो जाएं तो वे फिर खड़े नहीं रह पाते। मुझे कभी कोई सहायता मिली नहीं। मैंने तो करीब 10-15 साल लगातार नाकामयाबी देखी। एक एक्टर (उफ़ ये मोहब्बत,1996) के रूप में भी और बतौर निर्देशक भी मेरी पहली फिल्म ‘आर्यन’ (2006) नाकाम रही। यही वजह है कि आज कामयाब होने पर भी मैरे पैर जमीन पर मजबूती से टिके हैं। मैं आज भी वही साधारण इंसान हूं। कहते हैं कि फिल्म इंडस्ट्री के स्थापित परिवारों से जुड़े बच्चों को आसानी से मौके मिल जाते हैं। कहा जाता है कि फिल्म इंडस्ट्री में थोड़े भी कनेक्शन हो तो चीजें आसान हो जाती हैं,...

लिखना तनी रस्सी पर चलने के समान

मैं गहरी उदासियों के गीत सुनना चाहती हूँ। इश्क़ में सराबोर टूटती हुई सिसकियों हिचकियों और दरकती हुई हँसी में भींगे हुए गीत। लेकिन घर के दोनों बच्चे और उन बच्चों के दम पर हँसती-चहकती गृहस्थी उदासियों को सिरे से नकार देती है। इसलिए तमाम सारे डर और तवील उदासियों की पतवार उखाड़कर अपनी बालकनी पर के गमलों में हरियाली उगाते हैंए रंगीन मधुमालती के झाड़ रोपते हैं और काँटों के बीच से दहकते बुगनवेलिया को देखकर ख़ुश होते फिरते हैं। घर भरा-पूरा है। बच्चों की ख़ातिर कामवालियाँ सालों से मेरी तमाम ज़्यादतियाँ बर्दाश्त करती रहती हैं, मेरा साथ नहीं छोड़तीं। मेरे मम्मी-पापा, सास-ससुर अपनी-अपनी सहूलियतों को दरकिनार कर हमारी सहूलियत को मज़बूत बनाते रहते हैं। मैं वैसी एक ख़ुशनसीब औरत हूँ जिसके एक फोन कॉल पर उसका पूरा सपोर्ट सिस्टम अपनी सारी ताक़त लगाकर उसकी ज़रूरतें पूरी करता है। और मैं दुष्ट औरत उनके इस निस्सवार्थ मोहब्बत का ख़ूब बेजां इस्तेमाल भी करती हूँ। बात मई-जून की है। मैं एक नए प्रोजेक्ट के लिए स्क्रिप्ट लिखने की दुरूह कोशिश में पागल हुई जा रही थी। लॉन्ग फार्माटट मैंने कभी किया नहीं है, इसलिए बार-बार...